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आपका वंश तो बेटे चलाएंगे, उन्हीं से करवा लो तरक्की- 'सुपर सीएम' मायावती ने जब अपने पिता को दिया था ताना


लखनऊ : 

बात साल 1993 की है। तब बहुजन समाज पार्टी के समर्थन से समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे। बीएसपी के मुखिया कांशीराम ने पार्टी की तेज तर्रार युवा नेत्री मायावती को दोनों दलों के गठबंधन में समन्वय स्थापित करने के लिए खासतौर पर नियुक्त किया था। अपनी इस भूमिका पर मायावती सियासी गलियारों में 'महामुख्यमंत्री' कही जाती थीं। बताया जाता है कि मीडिया की ओर से दिए गए 'सुपर चीफ मिनिस्टर' की इस उपाधि पर मायावती काफी खुश होती थीं।

माया का काम मुलायम सिंह के नेतृत्व में बनी एसपी-बीएसपी की संयुक्त सरकार में दोनों दलों के बीच सामंजस्य बनाए रखना था, साथ ही सरकार में बहुजन समाज पार्टी के मुद्दों की दिशा में काम आगे बढ़ाने के लिए मुख्यमंत्री मुलायम सिंह को निर्देशित करना होता था। कई बार माया की कार्यशैली राज्य सरकार के काम अनावश्यक 'दखलंदाजी' कही जाती थी। इन सबके बीच ये बात तो तय थी कि बीते लोकसभा चुनावों में लगातार हार का सामना करने वाली मायावती का उत्तर प्रदेश में कद अचानक से काफी बढ़ गया था। वह 'सुपर चीफ मिनिस्टर' कही जा रही थीं।

बेटी से मदद मांगने पहुंचे पिता

उत्तर प्रदेश सरकार में मायावती की हैसियत बढ़ी तो उनके पैतृक गांव के लोगों की उम्मीदें भी बढ़ीं। मायावती के राजनीति में जाने के विरोधी रहे उनके पिता भी अपनी बेटी की उन्नति से काफी खुश, उत्साहित और आशान्वित थे। यही कारण था कि राज्य सरकार में हिस्सेदार अपनी बेटी से अपने गांव बादलपुर के लिए मायावती के पिता प्रभुदास विकास की परियोजनाएं मांगने चले गए थे। हालांकि, तब उनके साथ जो हुआ, उसकी वह कतई उम्मीद नहीं कर रहे थे।

कैसे थे पिता से माया के संबंध

मायावती के पिता प्रभुदास केंद्र सरकार के डाक-तार विभाग में क्लर्क की हैसियत से काम करते थे। शादी के बाद उनकी लगातार तीन बेटियां हुईं, जिनमें से एक दिल्ली के लेडी हार्डिंग अस्पताल में जन्मी मायावती भी थीं। लगातार तीन बेटियों के पिता बनने के बाद प्रभुदास पर रिश्तेदारों का दबाव बढ़ने लगा। उन्हें सलाह दी गई कि अपने पिता की इकलौती संतान प्रभुदास को अपने वंश को आगे चलाने के लिए एक बेटा चाहिए और इसके लिए उन्हें अब दूसरी शादी के बारे में सोचना चाहिए। प्रभुदास इस सलाह पर अमल करने के लिए भी तैयार हो रहे थे।

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मायावती अपनी आत्मकथा में बताती हैं कि वो उनके दादा मंगलसेन थे, जिन्होंने अपने बेटे प्रभुदास को दूसरी शादी करने से रोक दिया। अपनी पिता की इस मंशा को जानने के बाद मायावती को काफी तकलीफ पहुंची थी। उन्हें अपनी मां की व्यथा से काफी दुख पहुंचा था, जो पिता की दोबारा शादी करने की व्यग्रता से काफी अपमानित महसूस कर रही थीं। इस वजह से मायावती का अपने पिता के प्रति काफी अवहेलना भरा भाव था।

बेटों को ज्यादा अहम मानते थे पिता

मायावती का दुख सिर्फ यही नहीं था। तीन बेटियों होने के बाद प्रभुदास को 6 बेटे भी हुए, जो उनके लिए काफी गर्व का विषय बन गया था। वह इस बात से फूले नहीं समाते थे कि वह 6 बेटों के पिता हैं। बेटों के आने के बाद पिता का व्यवहार भी अपनी बेटियों के लिए बदल गया। मायावती ने खुद बताया है कि पिता ने अपनी बेटियों को पढ़ने के लिए फ्री फीस वाले सरकारी स्कूल में भेजा जबकि परिवार की सीमित आमदनी का बड़ा हिस्सा बेटों की प्राइवेट स्कूल में पढ़ाई पर खर्च किया जाता था।

पिता को दिया ताना

इसके अलावा पिता अपनी बेटी के राजनीति में कदम रखने के भी खिलाफ थे। वह चाहते थे कि मायावती पढ़-लिखकर जिलाधिकारी बनें, जिससे समाज में उनकी तथा उनके परिवार की हैसियत बढ़े। अपनी बेटी से वह अक्सर कहते थे, 'तुम (मायावती) बेशक बाबा साहेब अंबेडकर की तरह बड़ी हस्ती बन सकती हो लेकिन उसके लिए तुम्हें पढ़ाई-लिखाई करके जिला कलेक्टर बनना होगा।'

इन सब घटनाओं ने मायावती के मन में पिता के प्रति नफरत भर दी थी। पितृसत्तात्मक चरित्र वाले पिता से बेटी का यह घृणाभाव तब उभरकर सामने आया, जब माया उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक प्रभावी शख्सियत बन गई थीं और उनके पिता उनसे अपने गांव और इलाके के विकास के लिए बात करने लखनऊ आए थे।


'बेटों से करवा लो तरक्की'

मायावती को तब सुपर चीफ मिनिस्टर कहा जाने लगा था। उनके पैतृक गांव के लोग अपने काम निकलवाने के लिए उनके पास आने लगे थे। इसी दौरान एक दिन मायावती के पिता भी अपनी बेटी के पास लखनऊ पहुंचे। उन्होंने मायावती से अपने गांव बादलपुर के लिए जरूरी विकास परियोजनाओं की घोषणा करने का निवेदन किया। इस पर मायावती का पुराना गुस्सा भड़क उठा। वह अपने पिता से तंजात्मक लहजे में बोल पड़ीं, 'आपका वंश तो आपके बेटे चलाने वाले हैं। उन्हें ही बादलपुर ले जाओ और उन्हीं से करवा लो तरक्की। उन्हीं से स्कूल-अस्पताल-कॉलेज बनवा लो।'

मायावती की जीवनी लिखने वाले अजय बोस ने अपनी किताब 'बहनजी' में इस घटना का उल्लेख किया है। मायावती का ताना सुनकर उनके पिता भौचक्के रह गए। अपनी आत्मकथा में माया ने बताया है कि इसके बाद उनके पिता ने उनसे माफी मांगी और उनसे कहा कि मैंने यह महसूस कर लिया है कि मेरी जिंदगी में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण स्थान बेटी (मायावती) का ही है।

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